यहां आजकल खामोश होकर परिंदे भी रोते है
बे-गुनाह कत्ल इस धरती पर हर रोज क्यों होते हैं ।
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यह सोच लो अब आखिरी साया मोहब्बत है
इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा ।।
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चांद सा मिसरा अकेला है
मेरे कागज की छत पर तुम आके
मेरा शेर मुकक्मल कर दो ।।
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इस शहरे बे-वफा में जब भटकने लगो
मेरा दर खुला है इधर ही चले आना ।।
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तुमने नफरत की सड़क तामीर की
हमने प्यार के पुल उसपे बना दिए ।
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