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सोमवार, 23 नवंबर 2009

तेरी याद

लिपट गया तेरी यादों के झरोखों में
रात जब तनहाई ने मुझे घेरना चाहा
सन्‍नाटों ने लाख की कोशिशें अपनी
घने अंधरे ने भी मुझे डराना चाहा

हवा के तेज झोंखों से रही हिलती खिलकियां
जब कोई न था मेरे पास सुनने को सिसकियां
तेरी याद कुछ इस तरह से लिपटी रही मुझसे
जैसे अकेले में भी सहारा मुझे देना चाहा

तेरे प्‍यार को सलाम करता है यह शकील
जिसे हर बार तूने अपने में लिपटाना चाहा

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

गीत

काश के लम्‍हें ठहर ही जाते
जब तुम और हम साथ थे
तुम हकीकत में थी मेरे सामने
ऐसा लगा कि ख्‍वाब थे ।
काश के लम्‍हें...............
मुद्दतों के बाद मिले हम
प्‍यार से कैसे जी भर जाता
जितना मिलते उतना कम था
दिल को कैसे सूकून आता
अब तुमसे मिलने की ख्‍वाहिश लेकर
हम अपने दिल को हैं बहलाते
काश के लम्‍हे.............