यहां आजकल खामोश होकर परिंदे भी रोते है बे-गुनाह कत्ल इस धरती पर हर रोज क्यों होते हैं । **** यह सोच लो अब आखिरी साया मोहब्बत है इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा ।। **** चांद सा मिसरा अकेला है मेरे कागज की छत पर तुम आके मेरा शेर मुकक्मल कर दो ।। **** इस शहरे बे-वफा में जब भटकने लगो मेरा दर खुला है इधर ही चले आना ।। **** तुमने नफरत की सड़क तामीर की हमने प्यार के पुल उसपे बना दिए ।