पिछले 6 दशकों से हिंदी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित करने का प्रयास जारी है। भारत सरकार की राजभाषा नीति के अनुरूप भारत सरकार का प्रत्येक मंत्रालय/विभाग/बैंक इत्यादि राजभाषा के संवर्द्धन और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। प्रारंभिक वर्षों से ही हिंदी को राजभाषा के रूप स्थापित करने में कठिनाईयां आई। राजनीतिक शिकार होने के कारण हिंदी व्यवहारिकता के स्तर राजभाषा का स्थान ग्रहण नहीं कर पाई। राजभाषा के विकास हेतु अधिनियम, नियम, संकल्प और संसदीय राजभाषा समिति जैसी सर्वोच्च संस्थाओं का समर्थन हासिल है और साथ ही बहुसंख्यकों की भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं की सखी होने के परिणामस्वरूप हिंदी जनभाषा के रूप में भी अग्रणी है। परंतु यह अत्यंत कष्टप्रद है कि इतना कुछ समर्थन होने के बावजूद हिंदी राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित नहीं हो पा रही है। इसका साफ कारण सरकारी अनदेखी ही है। चूंकि सरकार अपनी भाषा नीति के कार्यान्वयन के प्रति गंभीर नहीं है। सरकारी आदेशों का खुले आम उल्लंघन यदि कहीं देखना हो तो वो राजभाषा के सरकारी आदेश ही है।
राजनीति से परे यदि राजभाषा को यदि किसी का सहारा अब बाकी है तो वह देश के उच्च पदों पर आसीन लोगों का ही है। हालांकि बड़े अधिकारी हिंदी में ज्यादा लिखना पसंद नहीं करते लेकिन सच तो यही है कि उच्चाधिकारी ही राजभाषा का सही कार्यान्वयन कर सकते हैं। इस प्रकार राजभाषा कार्यान्वयन में सबसे प्रमुख महत्ता विभिन्न कार्यालयों के उच्चाधिकारियों की है। अक्सर हम देख सकते हैं कि जो उच्चाधिकारी अपने कार्यालय में प्रशासनिक पकड़ मजबूत रखते हैं उनके आदेशों का कोई उल्लंघन नहीं करता फिर वह आदेश राजभाषा कार्यान्वयन का ही क्यों न हो।
राजभाषा कार्यान्वयन समिति की बैठकों में अध्यक्षता विभागाध्यक्ष द्वारा ही की जाती है और यदि अध्यक्ष सभी विभाग प्रमुखों से राजभाषा की समीक्षा पूरी गंभीरता से करता है तो इसका साफ असर निचले अधिकारियों में देखा जा सकता है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं कि कुशल उच्चाधिकारी के रहते विभागों में राजभाषा कार्यान्वयन को बल मिला है। लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसे उच्चाधिकारी बहुत कम संख्या में ही हैं। हम अक्सर यह देखते हैं कि उच्चाधिकारी किसी भी कार्यालय में गुणवत्ता उत्पादकता को बढ़ाने हेतु उत्तरदायी होते हैं और कुशल उच्चाधिकारी के सामने सभी अन्य अधिकारीगण हर कार्य को सही समय पर ही करने के लिए कार्य करते हैं वहीं राजभाषा के प्रति भी यदि उच्चाधिकारी राजभाषा विभागप्रमुख को जवाबदेह बनाते हैं वहां राजभाषा कार्यान्वयन अधिक सही ढंग से संभव हो पाता है। राजभाषा कार्यान्वयन में विभाग के उच्चाधिकारी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहती है। एक अच्छे और राजभाषा प्रेमी उच्चाधिकारी के छांव में राजभाषा अधिकारी भी कई गुणा अपने कार्यों के निष्पादन को बेहतर बनाता है।
अत: राजभाषा कार्यान्वयन में राजभाषा अधिकारी की भूमिका तभी आरंभ होती है जब उच्चाधिकारी उसे जवाबदेह बनाते हैं और उसे राजभाषा कार्यान्वयन के प्रति सचेत करते हैं। हालंकि वर्तमान में ऐसी स्थिति बहुत कम कार्यालयों में है परंतु उम्मीद से दुनिया कायम है आशा है कि उच्चाधिकारी भी राजभाषा कार्यान्वयन के प्रति अधिक सचेत होंगें।
मंगलवार, 29 मार्च 2011
मंगलवार, 18 जनवरी 2011
केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद की 50वीं वर्षगांठ
केंद्रीय सचिवालय हिन्दी परिषद की स्थापना 3 मई, 1960 को नई दिल्ली में हुई थी। इसके संस्थापक दूर-द्रष्टा स्व. श्री हरि बाबू कंसल थे। हाल ही में इस परिषद ने 50वीं वर्षगांठ आयोजित की। इस अवसर पर श्री महेशचंद्र गुप्त जी ने राजभाषा हिंदी पर अपना जो बीज व्याख्यान दिया, वो दृष्टवय है। उन्होंने अपने व्याख्यान में जो बातें रखी वो हिंदी की राजभाषा के रूप में स्थिति की सही तस्वीर थी। उनके व्याख्यान में एक महत्वपूर्ण बात निम्न थी:
राष्ट्र्भाषा: इस प्रसंग में राष्ट्रभाषा की चर्चा करना भी समयोचित/प्रसंगानूकूल होगा। गुजरात राज्य के उच्चे न्यायलय के एक न्यायमूर्ति ने उल्लेख किया कि हिंदी को किसी प्रलेख में राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया गया किंतु यह ध्यान दने योग्य है कि वर्तमान संविधान के पूर्व भी भारत था और भाषा भी थी। देश में अनेक महापुरूष थे और विभूतियां थी जिन्होंने विगत दो शताब्दिंयों से हिंदी का राष्ट्रभाषा घोषित किया जिसका अनके पुस्तकों में लिखित उल्लेख है। जिन्हें हम राष्ट्रपिता कहते हैं उनहोंने भी यत्र-तत्र-सर्वत्र हिंदी का राष्ट्रभाषा की संज्ञा दी। कुछ विद्वानों ने प्रश्न किया कि यदि स्वाधीनता के पश्चात हिंदी का राष्ट्रभाषा की संज्ञा देने की कोई अधिसूचना अथवा सांविधिक आदेश नहीं है तो राष्ट्रपिता का राष्ट्रपिता घोषित करने याराष्ट्रपिता की संज्ञा देने की क्या कोई अधिसूचना/सांविधिक आदेश है। यदि नहीं तो वे देश की मुद्रा यानि नोटों पर कैसे विराजमान है। अत: हम मानते हैं कि हिंदी राष्ट्रभाषा थी, है और रहेगी, इसी आधार पर ही तो यह सर्वसम्मसति से संविधान में संघ की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठिषत हुई। यह हिंदी पर कोई कृपा नहीं है और न ही कोई उपकार है।
यह शब्द उन तमाम अवरोधों पर विराम लगाते हैं तो तथाकथित कई पार्टियां अपनी राजनीति चमकाने के लिए करती हैं। आगे ,उन्होंने देश में राजभाषा कार्यान्वयन का कार्य देख रही सर्वोच्च संस्था राजभाषा विभाग और भारत सरकार के प्रत्येक मंत्रालय में पिछले कई दशकों से हिंदी की हो रही खुलेआम दुर्गति को भी सामने रखा।
इसमें कोई दोराय नहीं देश में स्वतंत्रता के बाद हिंदी की इतनी अनदेखी की गई है मानो यह हमारी भाषा न होकर अंग्रेजों की भाषा रही हो। देश के प्रधानमंत्री अंग्रेजी में ही बात करते हैं। गृह मंत्री तो हिंदी बोल भी अच्छी तरह से नहीं पाते जिस देश के दो उच्च् पदाधिकारी हिंदी की इस प्रकार अनदेखी करते हों वहां हिंदी के प्रति क्या सम्मान आएगा। देश के उद्योगपति हिंदी में बात करना अपनी तौहीन समझते हैं और मंत्रालयों में बैठे उच्चा्धिकारी तो अंग्रेजी की गुलामी करके इतरा रहे हैं। हमे शुक्र करना चाहिए कि ये लोग स्व्तंत्रता से पूर्व पैदा नहीं हुए नहीं तो देशद्रोहियों में शुमार होते।
देश के प्रत्येक सरकारी महकमों में हिंदी के आंकडों की पूरी बेशर्मी से धज्जियां उडाई जाती है। सच में देश की संसद मौन है। देश की संसद ही जब देश की भाषा की राजनीति करेगी तो वह दिन दूर नहीं जब देश का संविधान गले में फांसी लगाए किसी पेड पर लटकती लाश की तरह होगा और हमारे देश में ही कई देश बन बनेंगे।
पानी सर के ऊपर से निकल गया है। अभी समय है हमें हिंदी के प्रति गंभीरता लानी होगी अन्यथा यह देश कभी मानसिक रूप से स्वंतत्र नहीं हो पाएगा और अंग्रेजी गुलामों को पैदा करेगा।
जय हिंद जय हिंदी
राष्ट्र्भाषा: इस प्रसंग में राष्ट्रभाषा की चर्चा करना भी समयोचित/प्रसंगानूकूल होगा। गुजरात राज्य के उच्चे न्यायलय के एक न्यायमूर्ति ने उल्लेख किया कि हिंदी को किसी प्रलेख में राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया गया किंतु यह ध्यान दने योग्य है कि वर्तमान संविधान के पूर्व भी भारत था और भाषा भी थी। देश में अनेक महापुरूष थे और विभूतियां थी जिन्होंने विगत दो शताब्दिंयों से हिंदी का राष्ट्रभाषा घोषित किया जिसका अनके पुस्तकों में लिखित उल्लेख है। जिन्हें हम राष्ट्रपिता कहते हैं उनहोंने भी यत्र-तत्र-सर्वत्र हिंदी का राष्ट्रभाषा की संज्ञा दी। कुछ विद्वानों ने प्रश्न किया कि यदि स्वाधीनता के पश्चात हिंदी का राष्ट्रभाषा की संज्ञा देने की कोई अधिसूचना अथवा सांविधिक आदेश नहीं है तो राष्ट्रपिता का राष्ट्रपिता घोषित करने याराष्ट्रपिता की संज्ञा देने की क्या कोई अधिसूचना/सांविधिक आदेश है। यदि नहीं तो वे देश की मुद्रा यानि नोटों पर कैसे विराजमान है। अत: हम मानते हैं कि हिंदी राष्ट्रभाषा थी, है और रहेगी, इसी आधार पर ही तो यह सर्वसम्मसति से संविधान में संघ की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठिषत हुई। यह हिंदी पर कोई कृपा नहीं है और न ही कोई उपकार है।
यह शब्द उन तमाम अवरोधों पर विराम लगाते हैं तो तथाकथित कई पार्टियां अपनी राजनीति चमकाने के लिए करती हैं। आगे ,उन्होंने देश में राजभाषा कार्यान्वयन का कार्य देख रही सर्वोच्च संस्था राजभाषा विभाग और भारत सरकार के प्रत्येक मंत्रालय में पिछले कई दशकों से हिंदी की हो रही खुलेआम दुर्गति को भी सामने रखा।
इसमें कोई दोराय नहीं देश में स्वतंत्रता के बाद हिंदी की इतनी अनदेखी की गई है मानो यह हमारी भाषा न होकर अंग्रेजों की भाषा रही हो। देश के प्रधानमंत्री अंग्रेजी में ही बात करते हैं। गृह मंत्री तो हिंदी बोल भी अच्छी तरह से नहीं पाते जिस देश के दो उच्च् पदाधिकारी हिंदी की इस प्रकार अनदेखी करते हों वहां हिंदी के प्रति क्या सम्मान आएगा। देश के उद्योगपति हिंदी में बात करना अपनी तौहीन समझते हैं और मंत्रालयों में बैठे उच्चा्धिकारी तो अंग्रेजी की गुलामी करके इतरा रहे हैं। हमे शुक्र करना चाहिए कि ये लोग स्व्तंत्रता से पूर्व पैदा नहीं हुए नहीं तो देशद्रोहियों में शुमार होते।
देश के प्रत्येक सरकारी महकमों में हिंदी के आंकडों की पूरी बेशर्मी से धज्जियां उडाई जाती है। सच में देश की संसद मौन है। देश की संसद ही जब देश की भाषा की राजनीति करेगी तो वह दिन दूर नहीं जब देश का संविधान गले में फांसी लगाए किसी पेड पर लटकती लाश की तरह होगा और हमारे देश में ही कई देश बन बनेंगे।
पानी सर के ऊपर से निकल गया है। अभी समय है हमें हिंदी के प्रति गंभीरता लानी होगी अन्यथा यह देश कभी मानसिक रूप से स्वंतत्र नहीं हो पाएगा और अंग्रेजी गुलामों को पैदा करेगा।
जय हिंद जय हिंदी
बुधवार, 22 दिसंबर 2010
राजभाषा: अब नए हाथों में
राजभाषा के रूप में हिंदी की विकास यात्रा निरंतर जारी है। वर्ष दर वर्ष राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास तेज करने की बात भी बदस्तूर जारी है। आज सबसे महत्वपूर्ण बात जो सामने निकल कर आ रही है वह यह है कि पुराने युग की समाप्ति हो रही है और देश तकनीकी क्रांति देख रहा है। यह तकनीकी क्रांति आज से 30 वर्ष पूर्व राजभाषा से जुड़े व्यक्तियों के लिए एकदम नई है और एक चुनौती के रूप में खड़ी हो गई है। कुछ राजभाषा से जुड़े अधिकारी अपने आप को नए वातावरण के अनुकूल ढालने का प्रयास कर रहे हैं पर फिर भी अधिकतर तकनीकी दृष्टि से सक्षम नहीं है और इससे भी बढ़ी बात कि आगामी 2 से 3 वर्षों में राजभाषा की डोर नए युवाओं के हाथ में पूरी तरह से आने वाली है। यह भी दृष्टव्य है कि आज राजभाषा को लेकर फिर वहीं चुनौतियां सामने हैं जो 30 वर्ष पूर्व थी। तकनीकी क्रांति ने राजभाषा के लिए भी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं और अब नए राजभाषा अधिकारियों को फिर कहीं न कहीं नई शुरूआत करने की आवश्यकता है।
वर्तमान में सबसे बड़ा प्रश्न जो उभरकर सामने आ रहा है वह यह है कि क्या नए युवा राजभाषा को लेकर गंभीर हैं या केवल उन्होंने राजभाषा को रोजगार या आगे बढ़ने का माध्यम समझकर अपनाया है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि नए राजभाषा अधिकारियों की मन: स्थिति ही राजभाषा का अगला पड़ाव तय करने वाली है। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि यदि नए राजभाषा अधिकारी भी केवल अड़चनों और सरकारी उदासीनता का शिकार हुए तो शीघ्र ही राजभाषा के रूप में हिंदी अपने पतन को देख सकती है। मैं हमेशा से मानता हूं कि हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में आगे बढ़ने से विश्व की कोई ताकत नहीं रोक सकती और उसके लिए राजभाषा अधिकारियों की आवश्यकता भी नहीं है परंतु यदि हम राजभाषा के रूप में विचार करें तो सबसे कठिन चुनौतियां हमारे सामने हैं।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर हिंदी को राजभाषा के रूप में आगे कैसे बढ़ाया जाए? भारत में राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार को छोड़कर कोई भी सीधे राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए काम नहीं कर रहा है अर्थात संस्थाएं अपने व्यवसाय के अनुसार ही अपनी नीतियां तय करती है और ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है वहां राजभाषा की उपयोगिता को साबित करना। इसलिए हम चाहे किसी भी संस्था से जुड़े हो हमें वहां के कारोबार और कार्यकलापों के अनुरूप राजभाषा नीति का समन्वय बिठाने का प्रयास करना होगा। हिंदी कार्यशालाओं, संगोष्ठियों, सेमिनारों, सम्मेलनों, कार्यक्रमों को हमें संस्था विशेष की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालते हुए उसमें राजभाषा के महत्व को उजागर करना होगा। हमें हिंदी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं को भी बराबर महत्व देना होगा। इसमें कोई दोराय नहीं कि जो मैं लिख रहा हूं उसे संस्था विशेष की परिस्थितियों के अनुसार करना कठिन होता है परंतु असंभव नहीं है। इसके साथ ही राजभाषा अधिकारियों के लिए सबसे प्रमुख चुनौती है लोगों के हृदयों में हिंदी के प्रति उदासीनता और नकरात्मक सोच को हटाना। यह सत्य है जब आपके सामने हर समय अंग्रेजी के पत्र और सूचनाएं आती हैं तो यह उदासीनता पुख्ता होती जाती है परंतु यह कोई बड़ी समस्या नहीं यदि द्विभाषीकरण को सही रूप में अपनाया जाए तो इस समस्या को आसानी से दूर किया जा सकता है। हमारे वातावरण में अंग्रेजी नजर आती है तो सभी को लगता है अंग्रेजी बढ़ रही है तो इस वातावरण को ही बदल डालिए। हमें कार्यालयी वातावरण में हिंदी की हवाएं बहानी होगी तो लोग स्वयं ही इसकी खुश्बुओं में सराबोर हो जाएंगे।
दूसरे हमेशा यही कहिए हिंदी बढ़ रही है हम जितना कहेंगे यह बात हमारे मस्तिष्क पर उतनी ही गहरी होती जाएगी। हमेशा अपने संस्था के लोगों से मिलने पर कहें हिंदी आगे बढ़ रही है चाहे आपके मन में नकारात्मकताआ आ रही हो पर यह दूसरों के सामने न आने दें। जब हम लगातार लोगों के सामने यह कहेंगे और राजभाषा के लिए अपने काम भी जारी रखेगं तो निश्चय ही राजभाषा के प्रति सकारात्मक माहौल तैयार होगा।
यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि अधिकतर राजभाषा से जुड़े लोगों की अपनी सोच में भी हिंदी की प्रति उदासीनता दिखती है और ऐसी स्थिति में दूसरे से कोई भी अपेक्षा करना आधारहीन है।
तीसरे वर्तमान में हर संस्था में राजभाषा के नए बीज बोए जा रहे हैं अर्थात नए राजभाषा अधिकारियों की भर्ती की जा रही है। इनमें से कुछ अधिकारी बिल्कुल नए और कुछ थोड़ा बहुत अनुभवी हैं। संस्था के दूसरी अनुभवी अधिकारियों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह इन नए बीजों को अच्छी तरह से सींचे अर्थात उन्हें राजभाषा के प्रत्येक पक्ष की जानकारी दें क्योंकि यदि उन्हें सही या गलत जानकारी मिलती है तो वैसी ही जानकारी आगे बांटेंगे और सफल नहीं हो पाएंगे। प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इस बात का ध्यान दिया जाना चाहिए कि नए लोगों को राजभाषा नीति की स्टीक जानकारी दी जाए और प्रयास किए जाने चाहिए अपनी संस्था के अनुभवी या बाहरी संस्थाओं के सफल राजभाषा से जुड़े लोगों को बुलाया जाए। इन बीजों को मिट्टी के अनुरूप तैयार किया जाए और समय-समय पर सिंचित किया जाए तो आगे चलकर एक हरेभरे पेड़ के रूप में उभरेंगे।
वैसे तो राजभाषा के समुद्र में जाना और बाहर निकलना आसान नहीं, पर चलिए अगले लेख तक यहीं विराम लगाता हूं। जय हिंदी, जय हिंद, जय भारत
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर हिंदी को राजभाषा के रूप में आगे कैसे बढ़ाया जाए? भारत में राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार को छोड़कर कोई भी सीधे राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए काम नहीं कर रहा है अर्थात संस्थाएं अपने व्यवसाय के अनुसार ही अपनी नीतियां तय करती है और ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है वहां राजभाषा की उपयोगिता को साबित करना। इसलिए हम चाहे किसी भी संस्था से जुड़े हो हमें वहां के कारोबार और कार्यकलापों के अनुरूप राजभाषा नीति का समन्वय बिठाने का प्रयास करना होगा। हिंदी कार्यशालाओं, संगोष्ठियों, सेमिनारों, सम्मेलनों, कार्यक्रमों को हमें संस्था विशेष की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालते हुए उसमें राजभाषा के महत्व को उजागर करना होगा। हमें हिंदी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं को भी बराबर महत्व देना होगा। इसमें कोई दोराय नहीं कि जो मैं लिख रहा हूं उसे संस्था विशेष की परिस्थितियों के अनुसार करना कठिन होता है परंतु असंभव नहीं है। इसके साथ ही राजभाषा अधिकारियों के लिए सबसे प्रमुख चुनौती है लोगों के हृदयों में हिंदी के प्रति उदासीनता और नकरात्मक सोच को हटाना। यह सत्य है जब आपके सामने हर समय अंग्रेजी के पत्र और सूचनाएं आती हैं तो यह उदासीनता पुख्ता होती जाती है परंतु यह कोई बड़ी समस्या नहीं यदि द्विभाषीकरण को सही रूप में अपनाया जाए तो इस समस्या को आसानी से दूर किया जा सकता है। हमारे वातावरण में अंग्रेजी नजर आती है तो सभी को लगता है अंग्रेजी बढ़ रही है तो इस वातावरण को ही बदल डालिए। हमें कार्यालयी वातावरण में हिंदी की हवाएं बहानी होगी तो लोग स्वयं ही इसकी खुश्बुओं में सराबोर हो जाएंगे।
दूसरे हमेशा यही कहिए हिंदी बढ़ रही है हम जितना कहेंगे यह बात हमारे मस्तिष्क पर उतनी ही गहरी होती जाएगी। हमेशा अपने संस्था के लोगों से मिलने पर कहें हिंदी आगे बढ़ रही है चाहे आपके मन में नकारात्मकताआ आ रही हो पर यह दूसरों के सामने न आने दें। जब हम लगातार लोगों के सामने यह कहेंगे और राजभाषा के लिए अपने काम भी जारी रखेगं तो निश्चय ही राजभाषा के प्रति सकारात्मक माहौल तैयार होगा।
तीसरे वर्तमान में हर संस्था में राजभाषा के नए बीज बोए जा रहे हैं अर्थात नए राजभाषा अधिकारियों की भर्ती की जा रही है। इनमें से कुछ अधिकारी बिल्कुल नए और कुछ थोड़ा बहुत अनुभवी हैं। संस्था के दूसरी अनुभवी अधिकारियों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह इन नए बीजों को अच्छी तरह से सींचे अर्थात उन्हें राजभाषा के प्रत्येक पक्ष की जानकारी दें क्योंकि यदि उन्हें सही या गलत जानकारी मिलती है तो वैसी ही जानकारी आगे बांटेंगे और सफल नहीं हो पाएंगे। प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इस बात का ध्यान दिया जाना चाहिए कि नए लोगों को राजभाषा नीति की स्टीक जानकारी दी जाए और प्रयास किए जाने चाहिए अपनी संस्था के अनुभवी या बाहरी संस्थाओं के सफल राजभाषा से जुड़े लोगों को बुलाया जाए। इन बीजों को मिट्टी के अनुरूप तैयार किया जाए और समय-समय पर सिंचित किया जाए तो आगे चलकर एक हरेभरे पेड़ के रूप में उभरेंगे।
वैसे तो राजभाषा के समुद्र में जाना और बाहर निकलना आसान नहीं, पर चलिए अगले लेख तक यहीं विराम लगाता हूं। जय हिंदी, जय हिंद, जय भारत
बुधवार, 15 सितंबर 2010
हिंदी की खुशबु
हिंदी बने हमारे दिल की धड़कन
हिंदी बने हमारे मन की तड़पन।
हिंदी दिवस पर यही संदेश हमारा
हिंदी का गुणगान करे यह विश्व सारा।।
माना कि अभी कुछ कम है सहारा
पर कश्ती को आखिर मिलेगा किनारा।
हजारों जुगनुओं की रोशनी जब दूर कर सकती अंधियारा
तो हजारों हिंदी दीपों से रोशन जरूर होगा जग सारा।।
हिंदी पूरे भारत की शान बन जाए
इस दिल की तड़पन को थोड़ा आराम मिल जाए।
वादे जो करते हैं इस दिवस पर हम मिलकर
कितना अच्छा हो गर हम यह पूरे कर जाएं।।
यह दिवस है इस संकल्प को दोहराने का
सभी को प्रेरणा से जगाने का।
हिंदी की खुशबु को पूरे चमन में फैलाने का।।
हिंदी बने हमारे मन की तड़पन।
हिंदी दिवस पर यही संदेश हमारा
हिंदी का गुणगान करे यह विश्व सारा।।
माना कि अभी कुछ कम है सहारा
पर कश्ती को आखिर मिलेगा किनारा।
हजारों जुगनुओं की रोशनी जब दूर कर सकती अंधियारा
तो हजारों हिंदी दीपों से रोशन जरूर होगा जग सारा।।
हिंदी पूरे भारत की शान बन जाए
इस दिल की तड़पन को थोड़ा आराम मिल जाए।
वादे जो करते हैं इस दिवस पर हम मिलकर
कितना अच्छा हो गर हम यह पूरे कर जाएं।।
यह दिवस है इस संकल्प को दोहराने का
सभी को प्रेरणा से जगाने का।
हिंदी की खुशबु को पूरे चमन में फैलाने का।।
बुधवार, 4 अगस्त 2010
यादों की सौगात
पल दो पल की रूसवाईयों में,
बीत गई सारी जिन्दगी जुदाईयों में
तुझे भूलना चाहा और शायद भुला भी दिया
पर तू ही याद आया अकसर तनहायिओं में ।
ज़िन्दगी बहुत पीछे छूट गई,
हम बहुत आगे निकल आए
पर पन्ने पलट कर देखा जो इक रोज़
तेरा ही नाम लिखा था बेवफाईयों में ।।
यूं ही चलते-चलते,
साया तक साथ छोड़ गया
कोई ना रहा अपना ।
पर इक दिन देखा जो दर्दे जिगर में,
तू ही नज़र आया,दिल की गहराईयों में ।।
बीत गई सारी जिन्दगी जुदाईयों में
तुझे भूलना चाहा और शायद भुला भी दिया
पर तू ही याद आया अकसर तनहायिओं में ।
ज़िन्दगी बहुत पीछे छूट गई,
हम बहुत आगे निकल आए
पर पन्ने पलट कर देखा जो इक रोज़
तेरा ही नाम लिखा था बेवफाईयों में ।।
यूं ही चलते-चलते,
साया तक साथ छोड़ गया
कोई ना रहा अपना ।
पर इक दिन देखा जो दर्दे जिगर में,
तू ही नज़र आया,दिल की गहराईयों में ।।
गुरुवार, 15 जुलाई 2010
भारत की राजकीय मुद्रा

आज का दिन निश्चय ही राजभाषा के लिए भी अच्छी खबर लेकर आया है। रूपए के संकेतक में देवनागरी को यथास्थान देना निश्चिय ही राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। राजभाषा ने अपने लंबे समय में इस प्रकार के बहुत ही कम दिन देखे हैं जब उसे मस्तक पर बिठाया गया हालांकि रोमन के संकेतक का इसमें उल्लेख है परंतु मुख्य दृष्टि में देवनागरी का र ज्यादा दिखाई दे रहा है। सभी राजभाषा प्रेमियों के लिए यह विषय प्रसन्नता का है क्योंकि अब विश्व के प्रत्येक देश में हमारी देवनागरी लिपि का भी डंका बज गया है। कैबिनेट का यह फैसला स्वागत योग्य है। कितना ही अच्छा हो जब कैबिनेट ऐसे और प्रेरणीय कार्य करे जिससे राजभाषा का स्थान हमेशा शीर्ष पर रहे। श्री डी उदय कुमार को भी कोटि कोटि धन्यवाद जिन्होंने देवनागरी लिपि का प्रयोग कर ऐसा सुंदर संकेतक तैयार किया।
हालांकि राजभाषा के विकास के लिए तो अभी बहुत से प्रयास किए जाने शेष है लेकिन आज केवल हम इस बात को लेकर प्रसन्न रहें कि देर से सही हमारी आर्थिक शक्ति की पहचान में देश की भाषा विद्यमान है।
राजभाषा तेरी यूं ही हमेशा शान बनी रहे
तू हमेशा मेरा देश का अभिमान बनी रहे
तू यूं ही यश की प्राप्ति करे
आगे बढती रहे, बढती रहे
जय हिंदी
गुरुवार, 24 जून 2010
बरसात
बरसात की एक बूंद
मेरे तन पर
जब पड़ी
तो दिल की धडकनें
तेज हो गईं
और
मन में
एक बार
फिर
डर घर
करने लगा
कि इस
बार भी बाढ
का प्रकोप
कई जानें
लेने जरूर आएगा।
गरीब की
छत फिर जाएगी
अमीर की जेब
फिर राहत
के पैसे से
भर जाएगी।।
मेरे तन पर
जब पड़ी
तो दिल की धडकनें
तेज हो गईं
और
मन में
एक बार
फिर
डर घर
करने लगा
कि इस
बार भी बाढ
का प्रकोप
कई जानें
लेने जरूर आएगा।
गरीब की
छत फिर जाएगी
अमीर की जेब
फिर राहत
के पैसे से
भर जाएगी।।
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